आरएलडी के एनडीए में जाने से बदला खतौली का गणित
बीजेपी और सपा दोनों ने जीत का किया दावा
2027 में फिर बनेगी पश्चिम यूपी की सबसे हॉट सीटपश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर किसी विधानसभा सीट को सत्ता का थर्मामीटर कहा जाए, तो वह है मुजफ्फरनगर की खतौली सीट। यही वह सीट है जिसने कभी बीजेपी के मजबूत विजय रथ को रोककर पूरे प्रदेश की राजनीति को चौंका दिया था। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। राष्ट्रीय लोकदल अब बीजेपी के साथ है, समाजवादी पार्टी और चंद्रशेखर आजाद की राहें अलग हो चुकी हैं और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बाहुबली विधायक मदन भैया इस बदले हुए सियासी माहौल में अपनी सीट बचा पाएंगे? आइए समझते हैं खतौली की बदलती राजनीति का पूरा गणित।
मुजफ्फरनगर जिले की खतौली विधानसभा सीट लंबे समय तक राष्ट्रीय लोकदल का मजबूत गढ़ मानी जाती रही। वर्ष 2002 में यहां से आरएलडी के राजपाल सिंह बालियान ने जीत दर्ज की थी। लेकिन वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। ध्रुवीकरण की राजनीति ने नया मोड़ लिया और भारतीय जनता पार्टी ने इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बना ली।
इसी बदले हुए माहौल का असर 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भी दिखाई दिया। बीजेपी के विक्रम सैनी ने लगातार दो बार इस सीट पर जीत दर्ज की। हालांकि वर्ष 2022 में चुनाव जीतने के कुछ समय बाद दंगा मामले में दोषसिद्धि के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई। इसके बाद हुए उपचुनाव ने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
उपचुनाव में उस समय समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और आजाद समाज पार्टी एक साथ नजर आए। तीनों दलों ने साझा रणनीति के तहत मदन भैया को आरएलडी के टिकट पर मैदान में उतारा। दूसरी ओर बीजेपी ने विक्रम सैनी की पत्नी को उम्मीदवार बनाया। चुनावी मुकाबला बेहद चर्चित रहा और आखिरकार मदन भैया ने जीत दर्ज करते हुए यह सीट विपक्ष की झोली में डाल दी। उस जीत को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में विपक्ष की बड़ी सफलता माना गया था।
लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। राष्ट्रीय लोकदल अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए का हिस्सा है। वहीं समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी भी अलग-अलग राजनीतिक रास्तों पर आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में वह सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़, जिसने उपचुनाव में जीत दिलाई थी, अब पहले जैसा नहीं रहा। यही वजह है कि खतौली की लड़ाई एक बार फिर बेहद दिलचस्प होती दिखाई दे रही है।
अगर खतौली के जातीय समीकरण पर नजर डालें तो यह सीट पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे जटिल विधानसभा सीटों में मानी जाती है। यहां मुस्लिम मतदाता सबसे बड़ी संख्या में हैं। इसके बाद जाट, सैनी, जाटव, ठाकुर, कश्यप और पाल समाज भी चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यहां किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच बनने वाला गठजोड़ ही जीत और हार तय करता है।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि चुनाव हिंदू और मुस्लिम ध्रुवीकरण की दिशा में जाता है तो बीजेपी को इसका लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि जाट, गुर्जर, ठाकुर, कश्यप और अन्य प्रभावशाली वर्गों के वोटों में बिखराव होता है और विपक्ष सामाजिक समीकरण साधने में सफल रहता है तो मुकाबला पूरी तरह बदल सकता है। उपचुनाव में भी यही हुआ था, जब विभिन्न समुदायों के वोटों का बड़ा हिस्सा मदन भैया के पक्ष में गया और विपक्ष को जीत मिली।
अब बीजेपी पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी दिखाई दे रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि उपचुनाव में जो राजनीतिक चूक हुई थी, उससे सबक लिया जा चुका है। उनका दावा है कि केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पार्टी पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में है। बीजेपी का दावा है कि इस बार खतौली में प्रचंड जीत दर्ज की जाएगी।
वहीं समाजवादी पार्टी भी पीछे हटने के मूड में नहीं है। सपा नेताओं का कहना है कि आरएलडी के अलग होने के बावजूद उनका बूथ स्तर का संगठन मजबूत है। उनका दावा है कि लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में पार्टी बहुत कम अंतर से पीछे रही थी। सपा का आरोप है कि बेरोजगारी, बिजली की समस्या, किसानों की कर्जमाफी और अन्य स्थानीय मुद्दों पर जनता सरकार से नाराज है और यही नाराजगी 2027 में बदलाव का आधार बन सकती है।
कुल मिलाकर खतौली विधानसभा सीट एक बार फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित चुनावी सीट बनने की ओर बढ़ रही है। एक तरफ बीजेपी बदले हुए गठबंधन और अपने संगठनात्मक ढांचे के दम पर जीत का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी स्थानीय मुद्दों और अपने संगठन पर भरोसा जता रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मदन भैया बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच अपना प्रभाव बरकरार रख पाएंगे या फिर खतौली की जनता इस बार कोई नया फैसला सुनाएगी? इसका जवाब तो 2027 के चुनाव में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि इस सीट पर होने वाला मुकाबला पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।








