डॉ. डीएम मिश्र की किताब ‘आईना दर आईना’ में है जीवन बोध की गजलें

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लंबी है यह सियाहरात जानता हूं मैं
उम्मीद की किरण मगर तलाशता हूं मैं

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समीक्षक: श्रीधर मिश्र, गोरखपुर

डीएम मिश्र की गजलें वाकई आईना दर आईना की तरह जिंदगी को पर्त दर पर्त देखने व समझने की जीवन दृष्टि लिए हुए हैं।
छू लिया मिट्टी तो थोड़ा हाथ मैला हो गया
पर मेरा पानी से रिश्ता और गहरा हो गया
यह गजलें मिट्टी और पानी से आदमी को पुल सरीखी जोड़ती हैं। कवि में गहन जीवन- बोध व विलक्षण जीवन दृष्टि है तथा इनके समुच्चय से कवि की आलोचनात्मक चेतना अत्यंत प्रखर हुई है। डीएम मिश्र की काव्य चेतना का विकास उनके अनुभूत जीवन जगत की दुश्वारियों, शोषण, सर्वहारा वर्ग की दिक्कतों, सामाजिक मूल्य क्षरण, राजनैतिक विचलन से टकराने से हुआ लगता है, अतः वे बुनियादी तौर पर एक नाराज कवि दिखते हैं।

उनका यह आक्रोश मात्र खीज वह अवसाद के लिए नहीं है वरन यह परिवर्तन कामीआक्रोश है। दुष्यंत कुमार की गजलों में ऐसा लगने लगा था कि अब गजल अपने समय की तल्ख सच्चाईयों राजनीतिक व सामाजिक प्रपंच से वाबस्ता होकर राजनीतिक भाषा सीख रही है।

आपातकाल जैसे कठिन कालखंड में जिस सांकेतिकता के साथ दुष्यंत कुमार की गजलों ने प्रतिरोध दर्ज किया वह जनमानस को बहुत भाया और लोग उसके मुरीद हो गए। हालांकि डीएम मिश्र को दुष्यंत कुमार की परंपरा से जोड़ा जाना समीचीन होगा लेकिन कथ्य व भंगिमा, भाषा की तुर्शी वह तल्खी के चलते वे अदम गोंडवी के काव्य- सहोदर लगते हैं। राजनीतिक प्रपंचो, सामुदायिक विद्वेषों को अदम व डीएम मिश्र बड़े तेवर व ताप के साथ अपने शेरों में चरितार्थ करते है।
रोज किसी की सील टूटती पुरुषोत्तम के कमरे में

फिर शराब की बोतल खुलती पुरुषोत्तम के कमरे में
गांव की ताजी चिड़िया भून के प्लेट में रखी जाती हैं
फिर गिद्धों की दावत चलती पुरुषोत्तम के कमरे में
(डीएम मिश्र)
काजू भुने प्लेट में व्हिस्की की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में (अदम गोंडवी)

डीएम मिश्र की गजलों का पाठ करना वस्तुतः अपने समय की दुश्वारियां से नजरें मिलाना है। मैथ्यू अर्नाल्ड ने कहा था “कविता जीवन की समीक्षा है” और मार्क्स ने कहा था “कविता मनुष्यता की मातृभाषा है “। जीवन की समीक्षा करने वाली मातृभाषा का जो तेवर और अंदाज होना चाहिए वह डीएम मिश्र की गजलों में है। आज की राजनीति व उसके अपराधीकरण पर बेबाक व निर्भीक टिप्पणी करता यह शेर –
इसी को दोस्तों जम्हूरियत कहा जाता
चोर उचक्के भी देश के वजीर होते हैं
यही फटकार भरी आवाज में अदम के यहां कुछ यूं आता है-
जितने हरामखोर थे क़ुर्बो- जवार में
परधान बन कर आ गए अगली कतार में

डीएम मिश्र एक नाराज वह असंतुष्ट कवि हैं वे जिंदगी से जूझते हैं, जिंदगी का भाष्य करते हैं गजल के कंटेंट व फार्म या की विषय और रूप दोनों को लेकर भी जिरह करते हैं। यह जिरह अदम के यहाँ भी मिलती है। दुष्यंत के यहां गजल के फार्म को लेकर यह उलझन नहीं है, इसलिए गजल की पारंपरिक जमीन के बारे में उनके यहां किसी तरह की जिरह नहीं है।

गजल बड़ी कहो मगर सरल जुबान रहे
उठाओ सर तो हथेली पेआसमान रहे।
कविता में तेरी छंद अलंकार बहुत हैं
कविता में आदमी की मगर पीर कहां है।।
यही जिरह अदम गोंडवी के यहां कुछ इस तरह से आती है –
भूख के एहसास को शेरों सुखन तक ले चलो
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो।
जो गजल माशूक के जलवों से वाकिफ हो चुकी
अब उसे बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो।।
आज के कुप्रबंधन पर डीएम मिश्र का यह शेर-
तुम्हारी फाइलों में दर्ज क्या है वह तुम्हीं जानो
लगे हैं ढ़ेर मलवे के यहां टूटे सवालों के।।
इसी को अदम कुछ क्यों कहते हैं –
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर यह आंकड़े झूठे हैं यह दावा किताबी है।

डीएम मिश्र व अदम ग्राम्य चेतना के कवि हैं। उनकी ग्राम्य -जीवन की अनुभूतियां साझी हैं। अदम की भाषा का बीहड़ गजलों में फुफकार भर देता है, अदम की गजलें हमें समझाती सहेजती कम फटकारती हुई ज्यादा लगती हैं, डीएम मिश्र भी उसी काव्य चेतना के धरातल से संवाद करते हैं उनकी भी चिंताएं साझी हैं लेकिन डीएम में कलात्मक संयम अदम से भिन्न है, वे अपनी गजलों में पाठक से आत्मीय रिश्ता बनाए रखने के हामी हैं।

डीएम मिश्र के यहां गांव का जिक्र बार-बार आता है उनकी गजलों में गांव का पुराना रुपहला स्वरूप नहीं बल्कि आज के गांव का पता मिलता है, जहां गांव में पसरती कस्बाई संस्कृति के अध कचरेपन, गोलबंदी, छल- कपट, चुनाव का दृश्य बार-बार उभरता है-

गांवों का उत्थान देख कर आया हूं
मुखिया का दालान देख कर आया हूं
कल तक टूटी छान न थी अब पक्का है
नया-नया परधान देख कर आया हूं।।
यहीं कैलाश गौतम याद आते हैं-
मिला जवाहर योजना का जिस दिन अनुदान
नई जीप पर बैठकर घर पहुंचे परधान।
रामाधार पांडे की पंक्तियां हैं-
जब से पूरब में बनी परधान की कोठी
हमारे गांव में सूरज जरा तिरछा निकलता है।
डीएम मिश्र गांव के सम्बंध में यह भी कहते हैं-
सितारों के नगर में चाहता तो मैं भी बस जाता
मगर अपने गांव से नाता कभी तोड़ा नहीं मैंने

डीएम मिश्र की गजलों का रेंज बड़ा है। उनकी जीवन की बहुरंगी शायरी है।वह एक ओर अपने समय समाज की असंगतियों से संवाद करते हैं तो दूसरी और जीवन के मूल तत्व प्रेम से अपना सघन नाता बनाए रखते हैं, यह समन्वय दुर्लभ व अद्भुत है यहां डीएम मिश्र कुछ अदम से अलग दिखते हैं, क्योंकि अदम की शायरी बहुरंगी शायरी नहीं है। डीएम मिश्र के यहां प्रेम की छवियां कुछ इस प्रकार की हैं –
बहुत सोचोगे तो मुझसे मोहब्बत हो न पाएगी
वो दिल ही क्या न जो उसकी अदाओं पर मचल जाए।
उसकी इसी मासूमियत पर लोग फिदा हैं।
नजरें जो झुका ले तो उठाना नहीं आता।।

किसी कवि के संदर्भ में देखना यह चाहिए की रचना के सरोकारों में जीवन- बोधकी सकारात्मक वृत्तियां जागृत है अथवा नहीं। उसकी कविता किसके पक्ष में आवाज उठा रही है। समाज में उसकी कविता किसके साथ खड़ी है। डीएम मिश्र के कवि कर्म के सरोकारों की गहरी छानबीन की जाए तो उसके केंद्र में स्वाधीनता बोध है। यह स्वाधीनता का मूल्यबोध वैयक्तिक नहीं बल्कि सार्वजनिक व सामूहिक है।

मूल्यबोध को अस्तित्ववाद की कसौटी में रखकर नहीं जांचा परखा जा सकता बल्कि यह मूल्यबोध भारतीय समाज के औसत सर्वहारा वर्ग के दुर्निवार दुखों, यातनाओं की मनोभूमि से पैदा हुआ है।

अपने इसी स्वाधीनता बोध की प्रतिष्ठा में डीएम मिश्र समय, समाज, राजनीति, सांस्कृतिक विचलन की पड़ताल करते हैं व शोषण अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर मुखर करते हैं। उनकी दृष्टि में मनुष्यता के दुख को हरने में विचारधाराएं नाकाफी साबित हो रही हैं इसलिए वे जीवन का सत्य लोकमत के जरिए हासिल करना चाहते हैं यही कारण है कि उनके स्वाधीनता बोध की समूची अनुभूतियां देशज हैं।

डीएम मिश्र के गहन जीवनानुभव के चलते उनकी संवेदनशीलता का परिक्षेत्र विस्तीर्ण है, परंपरा, बाजार, राजनीति, धर्म, पाखंड, राजनीति अर्थात वे अपने समय के लगभग प्रत्येक जीवन क्षेत्र में सार्थक हस्तक्षेप करते हैं, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है कि उनका हस्तक्षेप आलोचनात्मक चेतना के साथ है। निम्न शेरों में उनकी विविध वर्णी बहुआयामी शायरी का पता चलता है-
रात कितनी भी लंबी क्यों न हो।
देखना रात के बाद होगी शहर। ।(आशा)
इनामों और तोहफ़ों की जरूरत ही नहीं समझी।
कटोरा हाथ में लेकर कभी मांगा नहीं मैंने।।(खुद्दारी)
मां-बाप की चाहत को भी पैसे से तोलते।
ऐसा ये कर्ज है जो चुकाया नहीं जाता।।( संस्कार)
हजारों बार इस बाजार में बिकना पड़ा फिर भी।।
खुशी इस बात की है हम जमीर अपना बचा लाए। (बाजार )
खुद-ब-खुद हर चीज घर बैठे हुए मिल जाएगी / रामनामी ओढ़कर कंठी पहन कर देखिए।।( पाखंड)
क्या रखा मंदिर मस्जिद में।
घर में ईश्वर अल्लाह रखा।।(धर्म )
यह अंधेरा ही ना होता तो बताओ फिर मुझे।
क्या पता चलता कि जीवन में सवेरा हो गया।।(दर्शन )
महीने भर का बच्चा मां की ममता को तरसता है।।
मगर मां क्या करे दफ्तर से जब छुट्टी नहीं पाती।।( स्त्री जीवन )
एक घड़ी भी जियो इक सदी की तरह।।
जिंदगी को जियो जिंदगी की तरह।।( जिजीविषा)
बोझ धान का लेकर वो जब हौले हौले चलती है।
धान की बाली कान की बाली दोनों संग संग बजती है ( श्रम-सौंदर्य)
डीएम मिश्र के यहाँ अपने समय से संवाद तो है ही साथ ही अपनी कविता की दीर्घ परंपरा का अपने समकालीन संदर्भ में पुनर्पाठ भी है –
घर से कभी मेहमां मेरा भूखा नहीं जाता।।
मेरे घर में गरीबी रहके मुझ पर नाज करती है।।
रहिमन इतना दीजिए जामे कुटुम समाय।
आप भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाए।।
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डीएम मिश्र की रचना धर्मिता की यह विशेषता सर्वाधिक ध्यान खींचती है कि -वह तर्क देती है, भाषण नहीं देती।
हृदयभेदी बात कहती है लेकिन सनसनी नहीं फैलाती। स्थितियों, दृश्य व घटनाओं का ऐसा ब्यौरा प्रस्तुत करती है कि जिसके भीतर से मनुष्य की जिंदगी का वह हिस्सा उभर कर प्रत्यक्ष हो जाता है जिस पर वह रोशनी डालना चाहती है। डीएम मिश्र की प्रमुख विशेषता के रूप में इस बात को भी रेखांकित करना जरूरी है कि वे जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि और रूढ़जीवन मूल्यों से विद्रोह कर नए काव्य व जीवन शास्त्र के औचित्य पर अपनी गजलों में बार-बार ज़िरह करते दिखते हैं।

वास्तव में डीएम मिश्र की संवेदना पूरी तरह जागरूक और सतर्क होते हुए भी सिर्फ शहराती नहीं है, उसमें गहरा ग्रामीण संस्कार भी है। इसीलिए उनकी गजलों में जाहिर सच्चाई सिर्फ शहराती सच्चाई नहीं है बल्कि उनमें शहराती बौद्धिकता और ग्रामीण संवेदना का एक रचनात्मक समन्वय है।

ग्रामीण संस्कार इनके यहां फैशनेबल आंचलिकता का रूप नहीं लेता। हिंदी ग़ज़ल के समक्ष यह बड़ी चुनौती भी है कि उसे ग़ज़ल में भारत की जातीय चेतना, विश्वासों, आस्था, मिथकों व परम्पराओं की पुनर्स्थापना ही नहीं करनी है बल्कि उनका अपने समय के सापेक्ष पुनर्पाठ भी करना है यह वही कवि करने में सक्षम होगा जिसे अपनी परम्पराओं से पूर्ण परिचय होगा, परम्पराबोधी होना किसी भी प्रकार से परम्परावादी होना नही होता, जो परम्पराबोधी होता है वही परम्परा का शोधन व उसका पुनर्पाठ कर पाता है, इसीलिये टीएस इलियट ने कवि के लिए उसमे व्यक्तिगत प्रज्ञा की अपेक्षा उसमे परम्पराबोध होने को अधिक महत्वपूर्ण माना है, डीएम मिश्र की ग़ज़लें इस लिए भी आश्वस्त करती हैं कि उनमें अपनी परम्पराओं से सम्वाद भी है व उनका समकालीन पुनर्पाठ भी है, यही कारण है कि उनकी कविता की जड़ें गहरी हैं।

रचनाकार के लिए विचार दृष्टि व काव्य दृष्टि महत्वपूर्ण होती है लेकिन मुझे लगता है किसी रचनाकार के लिए विचार दृष्टि व काव्य दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण होती है उसकी जीवन दृष्टि। अपनी प्रखर जीवन दृष्टि से वह अपने समय- समाज से संवाद भी कर पाता है वह अपनी आलोचनात्मक चेतना से असंगतियों- विसंगतियों की शिनाख्त भी कर पाता है। डीएम मिश्र अपनी प्रखर जीवन दृष्टि व आलोचनात्मक चेतना के बल पर अपने समय समाज की सम्यक समीक्षा कर पाते हैं। उनका रचना संसार अनलंकृत काव्य साधना का विरल उदाहरण है। उनके यहां कला के प्रति अतिरेक नहीं है।

कलात्मकता को साधने के प्रति विशेष आग्रह नहीं है, उनकी गजलों का लहजा बतकही का है। इन संवाद धर्मी गजलों की ताकत यह होती है कि यह जनसामान्य से अपना रिश्ता बड़ी सहजता से बना लेती हैं। इनमें कलात्मक संयम और सोद्देश्य कलात्मकता का समन्वय अद्भुत है। भाषिक विन्यास पुष्ट व विविध वर्णी है। इन गजलों में अपने समय की तस्वीर साफ साफ देखी जा सकती है और सुनी जा सकती है उसकी आवाज। इन गजलों में भाव संवेदना के साथ-साथ अपने समय की सटीक पहचान भी है।
इन गजलों में अपने समय की विसंगतियों के प्रति पूर्ण अस्वीकार वह एक बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष का आक्रोश साफ साफ झलकता है। अपने समय में प्रतिरोध रचती इन गजलों का विशेष महत्व है। निश्चित ही सुधी पाठकों को आईना दर आईना की गजलें आकृष्ट करेगी, व हिंदी गजल की संभावनाओं को आगे बढ़ाने में सहयोगी सिद्ध होंगी।

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