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Prabhat Kumar Roy
Prabhat Kumar Roy, IAS (Retd.)

पाकिस्तान के बिलोचिस्तान प्रांत में सशस्त्र बगावत यूं तो तकरीबन सत्ततर वर्ष पुरानी हो चुकी है और किसी ना किसी तौर पर सन् 1948 से निरंतर जारी रही है। किंतु अब तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि बिलूच बगावत का एक नया दौर प्रारंभ हो चुका है. क्योंकि जिस बड़े स्तर पर बिलोच विद्रोहियों ने गुरिल्ला हमले अंजाम दिए हैं, उससे पाक हुकूमत और उसकी फौज थर्रा उठी है। पाकिस्तान के प्रांत बलूचिस्तान के शहर क्वेटा से पेशावर के मार्ग पर दौड़ रही जाफर एक्सप्रेस नामक ट्रेन के ट्रैक को बलूच बागियों द्वारा उड़ा दिया गया। ट्रेन पर घात लगाकर बलूच बागियों द्वारा तकरीबन 300 से अधिक नागरिकों और सैनिकों को जाफर एक्सप्रेस ट्रेन से अगवा कर लिया गया।

पाक फौज ने सैन्य ऑपरेशन में कुछ नागरिकों और अपने सैनिको को बलूच विद्रोहियों की पकड़ से मुक्त करा लिया गया. विश्वसनीय सूत्रों के मताबिक अभी तकरीबन सौ से अधिक सैनिक बलूच लिबरेशन आर्मी की पकड़ में विद्यमान है. अपनी पुरानी रिवायती फितरत के मुताबिक पाकिस्तान हुकूमत के प्रवक्ता ने बयान जारी कर दिया कि पाकिस्तान में अंजाम दिए जाने वाले प्रत्येक दहशतगर्द आक्रमण की पृष्ठभूमि में भारत का सक्रिय हाथ हुआ करता है और जाफर एक्सप्रेस को अगवा करने की आतंकी वारदात के पीछे भी भारत की साज़िश मौजूद है।

पाक प्रवक्ता का कहना है कि भारत के साथ मिलकर अफगान सरगनाओं का भी इस वारदात को अंजाम देने में सक्रिय किरदार रहा है। पाक हुकूमत द्वारा आयद किए गए बेबुनियाद इल्जामों का भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता द्वारा वाजिब प्रतिउत्तर दे भी दिया गया। भारत सरकार के प्रवक्ता ने फरमाया कि समस्त विश्व बखूबी जानता है कि पाकिस्तान वैश्विक जेहादी आतंकवादियों की सबसे बड़ी पनाहगाह रहा है। अपने नृशंस गुनाहों के लिए किसी दूसरे मुल्क पर बेबुनियाद इल्ज़ाम आयद करने से पहले पाकिस्तान को अपने भीतर भी झांक लेना चाहिए। पाकिस्तान को अपने आंतरिक विद्रोह की वारदातों का ठीकरा दूसरे मुल्कों पर नहीं फोड़ना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि जाफर एक्सप्रेस पर हमला अंजाम देने की जिम्मेदारी बलूच लिबरेशन आर्मी द्वारा बाकायदा ले ली गई है। पाकिस्तान के हुकूमतपरस्त राजनीतिक विश्लेषक आजकल अजीत डोभाल के उस बयान का निरंतर हवाला दे रहे हैं, जो कि बलूचिस्तान को लेकर उन्होंने सन् 2014 में दिया था। अजीत डोभाल ने अपने बयान में फरमाया था कि पाकिस्तान भारत पर आतंकवादी हमले तो अंजाम दे सकता है, किंतु भारत के प्रतिशोध में आखिरकार पाकिस्तान द्वारा बलूचिस्तान को गंवाया जा सकता है। 15 अगस्त को लाल किले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलूचिस्तान का बाकायदा उल्लेख किया था।नरेंद्र मोदी ने बलूचों के ऊपर अंजाम दिए जा रहे, पाकिस्तानी फौज के जुल्मों सितम का प्रश्न भी प्रबलता से उठाया था।

उल्लेखनीय है कि पाक फौज द्वारा तकरीबन एक लाख से अधिक बलूचों का कत्ल ओ गारद अंजाम दिया जा चुका है और एक लाख बलूच नागरिक लापता हैं, जिनके विषय में अनुमान है कि उनको भी पाक फौज ने अगवा करकेे बंदी बना लिया अथवा हलाक कर दिया है. यूं तो बलूचिस्तान में पाकिस्तानी फौज द्वारा अंजाम दिए जा रहे जा रहे नृशंस जुल्मों सितम की सारी दुनिया में ही निरंतर निंदा की जाती रही है। बलूचों के प्रति प्रकट की गई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हार्दिक संवेदनाओं के प्रति उत्तर में बलूच लीटर ब्रह्मदग बुगती ने नरेंद्र मोदी को हार्दिक धन्यवाद अदा किया था। नरेंद्र मोदी द्वारा बलूचिस्तान का उल्लेख करने पर पाक हुक्मरान एकदम बौखला उठे थे। पाकिस्तान के हुक्मरान भारतीय हुकूमत पर खुफिया एजेंसी रॉ के माध्यम से बलूच विद्रोहियों की सक्रिय इमदाद करने का इल्जाम आयद करते रहे हैं।

अमेरिकन सीनेट में अमेरिकन सांसदों द्वारा एक प्रस्ताव पेश किया गया था। इस प्रस्ताव में पाकिस्तान की फौज के जुल्मों सितम का विस्तारपूर्वक उल्लेख करने के साथ ही साथ बलूचिस्तान को आत्मनिर्णय का अधिकार प्रदान करने की जबरदस्त पैरवी की गई थी। ह्यूमन राइट वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा अमेरिका कांग्रेस के समक्ष पाक हुकूमत पर यह इल्जाम आयद किया गया था कि विद्रोही प्रांत बलूचिस्तान में दमनकारी नीतियां अख्तियार करके निरंतर नृशंस तौर पर सैन्य बल प्रयोग कर रहा है।

12 मार्च मंगलवार को बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) द्वारा जाफर एक्सप्रेस पर अंजाम दिए गए आक्रमण के विषय में पाकिस्तानी फौज के प्रवक्ता का कहना है कि ट्रेन को अगवा करने वाले सारे बलूच विद्रोही मार दिए गए हैं और 300 से ज्यादा लोगों को उनके कब्जे से आजाद करा लिया गया है। जब कि बलूच लिबरेशन आर्मी के प्रवक्ता ने दावा किया है कि अभी भी पाकिस्तान सेना के 194 सैनिक उनके बंधक हैं।

इस संगीन वारदात की वास्तविक सच्चाई कुछ भी हो सकती है, लेकिन यह तथ्य एकदम स्पष्ट है कि विगत 19 वर्षों से से जब से सन 2006 में बलूच लीडर नवाब अकबर खान बुगती की हत्या पाक फौज द्वारा अंजाम दी गई है, तभी से बलूच विद्रोह मथर और तीव्र गति से निरंतर जारी रहा है। बलूचिस्तान का दुर्गम बोलान इलाका बलूच विद्रोहियों का केंद्र रहा है। बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह का निर्माण कर रहे चीन के इंजीनियरों के काफिलों पर अनेक दफा बलूच विद्रोहियों ने घात लगाकर आक्रमण अंजाम दिए हैं।

बलूच लिबरेशन आर्मी वस्तुतः बलूचिस्तान में चीन की गतिविधियों की निरंतर सशस्त्र मुखालिफ़त करती रही है। ग्वादर बंदरगाह के निर्माण में तकरीबन एक लाख चीनी कार्यरत हैं। बलूचों को चीन द्वारा निवेश किए गए 62 मिलियन डॉलर के इस विराट निर्माण कार्य में कदाचित शामिल नहीं किया जाता है। इस प्रोजेक्ट में चीनियों के अतिरिक्त केवल पाकिस्तान के पंजाबियों का बोलबाला है।

पाकिस्तान के प्रांत बलूचिस्तान की सरजमींन में अपार खनिज संपदा विद्यमान रही है। किंतु बलूच नागरिक बेहद गरीब हैं और उनकी औसत प्रतिदिन आमदनी ₹100 भी नहीं है। बलूचिस्तान का क्षेत्रफल वस्तुत पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का तकरीबन आधा है। बलूचों कबीलों की आबादी पाकिस्तान, अफगानिस्तान, और ईरान में फैली हुई है। ऐतिहासिक तौर पर बलूचिस्तान और पाकिस्तान के मध्य कभी भी सामान्य रिश्ते कायम नहीं रहे।

बलूच सरदार कलात खान और बलूचिस्तान स्टेट खुद को स्वतंत्र और खुद मुख्तार कायम बनाएं रखने का प्रबल पक्षधर रहा था। उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश राज के दौर में भी नेपाल और भूटान की तरह बलूचिस्तान को भी स्वायत्तता और आजादी हासिल रही थी। सन् 1947 में भारत के विभाजन के तत्पश्चात निर्मित हुआ था पाकिस्तान, जिसके सर्वोच्च लीडर मोहम्मद अली जिन्ना ने आरंभ में स्वतंत्र बलूचिस्तान स्टेट के अस्तित्व को बाकायदा स्वीकार कर लिया था। किंतु अगले ही वर्ष सन् 1948 में बलूचिस्तान को मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी फौजी ताकत द्वारा जबरन पाकिस्तान में शामिल कर लिया।

पाकिस्तान हुकूमत द्वारा अंजाम दिए गए इस जबरन संविलय को कलात शासक मीर खान और बलूचों ने कदाचित स्वीकार नहीं किया था। जबरन विलय के विरुद्ध बलूचों ने सन् 1948 से लेकर सन् 1957 तक पाक फौज के विरुद्ध निरंतर सशस्त्र संग्राम किया था। बलूचों के दस वर्षीय सशस्त्र संग्राम का नेतृत्व नौरोज खान नामक एक क्रांतिकारी गोरिल्ला लीडर द्वारा किया गया था। आखिरकार पाक फौज द्वारा अमेरिका और फ्रांस से हासिल किए गए लड़ाकू विमानों द्वारा बलूचिस्तान पर वर्बर तौर पर कॉरपेट बमबारी अंजाम दी गई। तब कहीं जाकर कलात खान और नौरोज खान के नेतृत्व में विद्रोही बलूचों ने सन् 1957 पाकिस्तानी फौज के सामने आत्मसमर्पण किया।

पाकिस्तान में बलूचों की आबादी तकरीबन एक करोड़ है। कुल मिलाकर बलूचों की कुल आबादी तकरीबन दो करोड़ है, जोकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान में फैली हुई है बलूचिस्तान में बलूचों के मुख्यतः दो धड़े विद्यमान हैं। बलूचों का एक धड़ा बलूच जुबान बोलता हैं दूसरा धड़ा ब्राहू भाषा बोलता है जो कि एक द्रविड़ भाषा है। बलूचिस्तान का बड़ा हिस्सा एक सर्द रेगिस्तान है, जो ईरानी पठार के पूर्वी छोर पर स्थित है. यही वह इलाका है जहां पर तेल और प्राकृतिक गैस के अकूत भंडार विद्यमान है। बलूचिस्तान के सुई इलाके से समस्त पाकिस्तान को प्राकृतिक गैस की सप्लाई की जाती रही है।

सन 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के पश्चात बलूचों के अंदर भी फिर से एक नई उम्मीद और एक नया उत्साह उत्पन्न हुआ था। सन् 1973 में पाकिस्तान के जबरन अधिपत्य के विरुद्ध बलूचों ने फिर से हथियार उठा लिए थे। सन् 1973 में बलूच विद्रोहियों का नेतृत्व बलूचिस्तान के मार्क्सवादियों के हाथों में था। मार्क्सवादी बलूच पीपुल्स लिब्रेशन फ्रंट के तकरीबन दस हजार मार्क्सवादी बलूच छापामारों ने पाकिस्तान की 10 डिवीजन फौज की छक्के छुड़ा दिए थे। अमेरिका द्वारा प्रदान किए गये फाइटर जेट्स द्वारा बलूचिस्तान पर नापाम बमों से भयानक बमबारी अंजाम दी गई और बलूचों की बगावत को नृशंसतापूर्वक कुचल दिया गया। बलूच गोरिल्लाओं और पाक फौज के मध्य संघर्ष में हजारों बलूच नागरिक हलाक हो गए थे।

पांच हजार से अधिक मार्क्सवादी बलूच विद्रोही और तीन हजार से अधिक पाक सैनिक सन् 1973 से सन् 1975 तक जारी रहे गृहयुद्ध हताहत हो गए थे। उसे वक्त भी पाक हुकूमत ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर इल्जाम आयद किया था कि उन्होंने बलूचिस्तान को पाकिस्तान से पृथक करने के लिए अपनी खुफिया एजेंसी रॉ का बाकायदा इस्तेमाल किया था। समस्त नृशंस सैन्य जुल्मों सितम और दमन के बावजूद भी बलूचों में पाकिस्तान के सैन्य अधिपत्य से आजादी हासिल कर लेने की आकांक्षा और ललक कभी भी खत्म नहीं हुई।

सन् 2000 में नवाब अकबर खान बुगती के नेतृत्व में एक बार फिर से बलूच विद्रोहियों ने हथियार उठा लिए। सन् 2006 में बलूच लीडर अकबर खान बुगती की पाक फौज द्वारा हत्या कर दी गई। इसके बाद उनके बेटे ब्रह्मदग बुगती ने बलूच विद्रोहियों का नेतृत्व संभाल लिया है। पाक हुकूमत की गुलामी से पूर्णतः मुक्त होकर ही बलूच अब दम लेगे.

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