
(लेखक अखिल भारतीय रेलवे सेवा में अधिकारी हैं)
कुछ ही दिन पहले की बात है। एक पुराने मित्र के घर जाना हुआ। बरसों बाद मिलना हुआ था, और संयोग ऐसा कि उस दिन उसके विद्यालय की छुट्टी थी — सो पूरा दिन साथ बीता। मित्र और उसकी जीवनसंगिनी ने ऐसी आत्मीयता से आवभगत की कि परायापन कहीं टिक ही न सका। दिन ढला, बातों के बीच शाम उतर आई, और तय हुआ कि रात एक फ़िल्म देखी जाए।
उसी रात मेरी माँ, मेरी बहन से मिलकर ट्रेन से लौट रही थीं — पहुँचने का समय कोई रात का एक बजे रहा होगा। इसी बीच मित्र की पत्नी ने बड़े सहज स्नेह से पूछा — “माँ जी किस समय पहुँचेंगी? और उन्हें खाने में क्या पसंद है, ताकि उनके लिए वही बना दूँ।” शादी के तीन बरसों में यह पहला अवसर था जब उनका मेरी माँ से मिलना होने वाला था; स्वाभाविक ही था कि पहली भेंट पर अच्छा प्रभाव छोड़ने की एक कोमल-सी चाह उनके मन में रही होगी। इसीलिए यह प्रश्न आया।
पर देखिए, यह प्रश्न जितना सरल था, मेरे भीतर उतना ही गहरा उतर गया। “माँ को खाने में क्या पसंद है?” — और मैं ठिठक गया। कुछ पल सोचता रहा, स्मृति के कोने-कोने टटोले, पर कोई ठीक-ठीक उत्तर हाथ न आया। जो बात इतनी सामान्य होनी चाहिए थी, वह मेरे लिए यक्षप्रश्न बन गई। मन ही मन एक शर्मिंदगी-सी घेरने लगी। उस क्षण तो टाल गया — “भाभीजी, कुछ भी बना लीजिए, वे खा लेंगी।” पर यह वाक्य मेरे भीतर काँटे की तरह अटका रह गया।
क्योंकि मैं जानता था — यदि यही प्रश्न मेरी माँ से मेरे या घर के किसी सदस्य के बारे में पूछा जाता, तो वे न केवल यह बतातीं कि क्या पसंद है, बल्कि यह भी जोड़ देतीं कि क्या नापसंद है, कौन-सी चीज़ किस मौसम में भाती है, कब किसका मन उचटता है। माँ ऐसी ही होती है — उसकी हर संतान का पूरा हिसाब उसके पास होता है, बिना किसी बही-खाते के। और मुझे लगा, यदि मेरी माँ की भी कोई पसंद-नापसंद रही होगी, तो उसका सबसे सच्चा उत्तर शायद उनकी माँ के पास ही रहा होगा। स्नेह की यह पूँजी पीढ़ी-दर-पीढ़ी नीचे की ओर बहती है — ऊपर की ओर लौटना जैसे भूल ही जाती है।
और यहीं से बात एक निजी शर्मिंदगी से उठकर एक बड़े सामाजिक सत्य की ओर मुड़ जाती है।
बात केवल इतनी नहीं कि इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं था। बात यह है कि हमारी पीढ़ी किस अनजाने ढंग से अपने ही परिवार से कटती चली जा रही है। माँ हो या पिता, दादा हों या दादी — हम उन्हें यह मानकर एक कोने में रख देते हैं कि “वे पुरानी पीढ़ी के हैं, ये बातें नहीं समझेंगे।” प्रेमचंद के ‘बूढ़ी काकी’ की उपेक्षा और भीष्म साहनी की कहानियों का वह मौन दर्द आज भी जैसे हमारे घरों की दीवारों में गूँज रहा है। ऐसा नहीं कि यह संकट पहली बार आया हो — पीढ़ियों के बीच का यह तनाव तो सामाजिक विकास की सनातन प्रक्रिया का हिस्सा रहा है; हर नई पीढ़ी ने अपनी पुरानी पीढ़ी से थोड़ी असहमति, थोड़ा विद्रोह किया है। पर इस बार संकट कहीं अधिक गहरा है, क्योंकि इस बार इसके साथ अनेक नए कारक जुड़ गए हैं — मोबाइल का एकांतवास, अकेले रहने का बढ़ता चलन, और पश्चिमी जीवनशैली को ही मानक मान लेने की अंधी होड़।
इन्हीं कारणों से नई पीढ़ी अपनी हर आवश्यकता — भावनात्मक हो या मानसिक — का समाधान परिवार के बाहर तलाशने लगी है। परिणाम यह कि एक ओर युवा पीढ़ी तनाव और अवसाद के भँवर में डूब रही है, और उससे उबरने के लिए व्यसनों का सहारा ढूँढ़ रही है; दूसरी ओर बुज़ुर्ग पीढ़ी अकेलेपन की मार झेल रही है, एक सहारे को, एक बातचीत को तरसती हुई। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इसी टूटन का ठंडा आँकड़ा है — जिन घरों में कभी तीन पीढ़ियाँ एक आँगन साझा करती थीं, वहाँ अब कमरों के बीच दीवारें ही नहीं, चुप्पियाँ भी खड़ी हो गई हैं।
संभ्रांत वर्ग में तो यह संकट और भी विकराल रूप में दिखता है — या तो बच्चे माता-पिता के साथ रहते ही नहीं, और यदि एक छत के नीचे रहते भी हैं, तो बातचीत नाममात्र की। हर कोई अपने कमरे में, अपने पर्दे पर, इंटरनेट की आभासी दुनिया में अपने अकेलेपन का इलाज ढूँढ़ता है। सामाजिक ताना-बाना जो सदियों में बुना गया था, वह हमारी आँखों के सामने तेज़ी से उधड़ रहा है।
और यह विघटन प्रायः परिवार की आर्थिक आवश्यकता से शुरू होता है, पर वहीं नहीं रुकता। धीरे-धीरे पैसों की बढ़ती भूख, विलासिता की लालसा और निजता के अतिवादी विचार ऐसे पनपने लगते हैं मानो परिवार की सारी समस्याओं की जड़ पिछली पीढ़ी की सोच ही हो। इस सबके पीछे उपभोक्तावाद की मौन साज़िश भी है। बाज़ार को नई पीढ़ी को उपभोक्ता बनाना है — और इसलिए विज्ञापनों में संयुक्त परिवार अब लगभग गायब हो चुका है।
ध्यान से देखिए, आज मीडिया और इंटरनेट हमारी पसंद ही नहीं, हमारी सोच तक को चुपचाप गढ़ रहे हैं। वे तय कर रहे हैं कि हम किसे सफलता कहें, किसे सुख, और किसे अनावश्यक बोझ। इन सबका सम्मिलित प्रभाव पहले वैचारिक अलगाव के रूप में आता है, और फिर धीरे-धीरे वैयक्तिक अलगाव में बदल जाता है — जो अंततः दोनों ही पीढ़ियों को एक ही रोग के दो सिरों पर ला खड़ा करता है: अकेलापन।
यह संकट यहीं थमने वाला नहीं। जिस तरह हम आर्थिक विकास को ही हर समस्या का एकमात्र समाधान मानकर चल पड़े हैं, उससे यह दरार और चौड़ी होगी। पर अभी सँभलने का समय है। और उपाय हमें सबसे पहले अपने ही घर की देहरी से शुरू करने होंगे।
परिवार के स्तर पर हमें बचपन से ही बच्चों को यह समझाना होगा कि पैसे और रिश्तों के बीच का संबंध क्या है — यह कि धन जीवन का साधन है, साध्य नहीं। और चूँकि बच्चे उपदेश से कम, आचरण से अधिक सीखते हैं, इसलिए यह हमें कहना नहीं, जीना होगा। हमें परिवार को ऐसा बनाना होगा जहाँ हर सदस्य अपनी भावनात्मक और मानसिक ज़रूरतें घर के भीतर ही पूरी कर सके — विशेषकर वे किशोर, जिन्हें लगता है कि “परिवार मुझे समझ ही नहीं पाएगा।” बच्चों को घर में अपने विचार खुलकर रखने की स्वतंत्रता देनी होगी, और उनकी शंकाओं का समाधान डाँट से नहीं, धैर्य और प्रेम से करना होगा।
सामाजिक स्तर पर हमें हर बच्चे के व्यक्तित्व को मौलिक मानकर उन्हें एक ही साँचे में ढालने का व्यर्थ प्रयास छोड़ना होगा। तुलना ईर्ष्या की जननी है — स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भले रहे, पर उसे विष बनने से रोकना होगा। और सबसे बड़ी बात — हमें सफलता की परिभाषा बदलनी होगी। जब कोई इंजीनियर या डॉक्टर बनता है, तो हम उसकी सफलता को उसके वार्षिक वेतन के तराज़ू पर तौलते हैं; और यहीं से बालमन में यह विचार पनपता है कि पैसा ही जीवन का आधार है। वहीं घर के बुज़ुर्गों को भी यह समझना होगा कि सामाजिक विकास के इस दौर में नई पीढ़ी को कुछ निजता और आत्म-विकास की स्वतंत्रता देनी ही होगी — प्रेम का अर्थ पकड़ रखना नहीं, थामे रहना है।
अंततः, हमारे समाज को एक बात स्पष्ट रूप से आत्मसात करनी होगी — व्यक्ति की आर्थिक आवश्यकताएँ भले परिवार के बाहर पूरी हों, पर उसकी भावनात्मक और मानसिक भूख की तृप्ति परिवार के भीतर से ही होनी चाहिए। घर केवल ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं, वह वह स्थान है जहाँ लौटकर मनुष्य फिर से मनुष्य बनता है। इन्हीं दो छोरों — आर्थिक और भावनात्मक — के बीच जब हम संतुलन साध लेंगे, तभी समाज का सच्चे अर्थों में विकास होगा।
और शायद तब, जब कोई पूछेगा — “माँ को खाने में क्या पसंद है?” — तो हम ठिठकेंगे नहीं। हमारे पास उत्तर होगा। क्योंकि जिस दिन हम अपनी माँ की पसंद जान लेंगे, उस दिन हम अपने घर लौट आए होंगे।

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