महंगाई रोकने की कीमत आम आदमी क्यों चुकाए

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भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत करने का फैसला ऐसे समय आया है, जब महंगाई और रुपए की विनिमय दर को लेकर दबाव की स्थिति बताई जा रही है। केंद्रीय बैंक के सामने कीमतों को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास की गति बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। लेकिन इस संतुलन की कीमत अंततः आम उपभोक्ता और कर्ज लेने वाले लोगों को कितनी चुकानी पड़ेगी, यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

रेपो दर बढ़ने का सीधा असर बैंक से मिलने वाले कर्ज पर पड़ सकता है। आवास, वाहन और कारोबार के लिए ऋण लेने वालों को अधिक ब्याज चुकाना पड़ सकता है। जिन लोगों के कर्ज की ब्याज दर परिवर्तनीय है, उनकी मासिक किस्त बढ़ने की भी आशंका रहती है। त्योहारों के मौसम में जब परिवार घर या वाहन खरीदने और छोटे कारोबारी अपने कारोबार के विस्तार की योजना बनाते हैं, तब महंगे कर्ज का असर उनके बजट पर पड़ना स्वाभाविक है।

मौद्रिक नीति के स्तर पर रेपो दर बढ़ाने का तर्क यह है कि महंगा कर्ज मांग को नियंत्रित करता है। उपभोक्ता खर्च कम कर सकते हैं और कंपनियां निवेश की योजनाएं टाल सकती हैं। मांग पर दबाव पड़ने से उत्पादकों के लिए कीमतें बढ़ाना कठिन हो सकता है और इस तरह महंगाई पर नियंत्रण की कोशिश की जाती है। लेकिन यह उपाय हर तरह की महंगाई का समाधान नहीं हो सकता।

खाद्य वस्तुओं की कीमतें यदि आपूर्ति की कमी, खराब मानसून या आपूर्ति शृंखला में बाधा के कारण बढ़ रही हों, तो ब्याज दर बढ़ाने से खेत से बाजार तक की समस्या दूर नहीं होगी। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि या भू-राजनीतिक संकट से पैदा महंगाई को भी केवल महंगे कर्ज के जरिए नियंत्रित करना कठिन है। ऐसे मामलों में सरकार को आपूर्ति बढ़ाने, भंडारण और वितरण व्यवस्था सुधारने तथा आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने जैसे उपाय करने होंगे।

रेपो दर में बढ़ोतरी का दूसरा पक्ष आर्थिक विकास है। महंगा कर्ज कंपनियों के निवेश को प्रभावित कर सकता है और छोटे तथा मध्यम कारोबारों के लिए कार्यशील पूंजी जुटाना कठिन बना सकता है। यदि निवेश की रफ्तार घटती है, तो उसका असर उत्पादन और रोजगार पर भी पड़ सकता है। इसलिए महंगाई पर नियंत्रण की नीति ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे आर्थिक गतिविधियों पर अनावश्यक दबाव पैदा हो।

खासकर छोटे कारोबारों के लिए ब्याज दर का असर अधिक गंभीर हो सकता है, क्योंकि उनकी वित्तीय क्षमता बड़ी कंपनियों की तुलना में सीमित होती है। ऐसे समय में ऋण की लागत बढ़ने से विस्तार की योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। सरकार और वित्तीय संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि महंगाई नियंत्रण के प्रयासों के बीच उत्पादक क्षेत्रों को वित्त की उपलब्धता पूरी तरह बाधित न हो।

रेपो दर बढ़ाने का फैसला केंद्रीय बैंक के अधिकार क्षेत्र में आने वाली मौद्रिक नीति का हिस्सा है, लेकिन महंगाई से लड़ाई केवल केंद्रीय बैंक की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। यदि समस्या मांग से ज्यादा आपूर्ति की है, तो समाधान भी आपूर्ति पक्ष में तलाशना होगा। उत्पादन बढ़ाने, कृषि और खाद्य आपूर्ति शृंखला मजबूत करने, ऊर्जा लागत पर नजर रखने और रोजगार पैदा करने वाली आर्थिक गतिविधियों को गति देने की जरूरत होगी।

महंगाई पर नियंत्रण और विकास के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है। लेकिन नीति की सफलता तभी मानी जाएगी जब कीमतों पर दबाव कम होने के साथ आम लोगों की क्रय शक्ति और रोजगार के अवसर भी सुरक्षित रहें। रेपो दर बढ़ाकर महंगाई पर अंकुश लगाने की कोशिश जरूरी हो सकती है, मगर उसके साथ ऐसे कदम भी जरूरी हैं जो महंगे कर्ज का बोझ कम करने और अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद करें। आखिर आर्थिक नीति का अंतिम उद्देश्य केवल आंकड़ों में महंगाई घटाना नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन को आर्थिक रूप से अधिक सुरक्षित बनाना होना चाहिए।