
एसआईआर, मतदाता सूची और संस्थागत संतुलन पर बहस
भारतीय लोकतंत्र के संचालन में चुनाव आयोग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में उसकी कार्यप्रणाली, निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर उठने वाले सवालों का गंभीरता से परीक्षण जरूरी है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक विस्तृत पड़ताल के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सार्वजनिक स्तर पर उठी आशंकाओं की गूंज चुनाव आयोग के भीतर भी सुनाई दी। रिपोर्ट के मुताबिक तीन चुनाव आयुक्तों में से दो – सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी – ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर आपत्तियां दर्ज कराईं।
रिपोर्ट के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों ने नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने, मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण और सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता जैसे मुद्दों पर असहमति जताई। उन्होंने अपनी शिकायतें कैबिनेट सचिव तक भी पहुंचाईं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले 10 महीनों में दोनों आयुक्तों ने कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।
कानून के तहत तीनों चुनाव आयुक्तों के अधिकार समान हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को ‘बराबरी वालों में प्रथम’ माना जाता है, लेकिन इस व्यवस्था में महत्वपूर्ण निर्णयों पर संस्थागत विचार-विमर्श का महत्व बना रहता है। रिपोर्ट के मुताबिक 30 जून 2025 को बिहार से शुरू हुए नवीनतम एसआईआर अभियान के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए हैं।
आपत्तियों का एक प्रमुख विषय नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़ा फॉर्म-6 बताया गया है। इसमें आवेदकों से उनके माता-पिता या दादा-दादी के नाम पहले की मतदाता सूचियों में दर्ज होने की जानकारी मांगी गई। रिपोर्ट के अनुसार दोनों असहमत चुनाव आयुक्तों ने इस प्रावधान को लेकर सवाल उठाए और कहा कि संबंधित नियमों में सरकारी संशोधन के बिना ऐसी शर्त नहीं जोड़ी जानी चाहिए थी। इसके बावजूद यह बदलाव लागू किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
मतदाता सूचियों के डेटाबेस के केंद्रीकरण को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए। निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी जमीनी स्तर पर वैधानिक प्राधिकरण होते हैं और मतदाता सूची की शुचिता बनाए रखने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर ने कुछ मामलों में इन अधिकारियों के निर्णयों को पलट दिया। इससे पात्र मतदाताओं के नाम हटने और मतदान के अधिकार से वंचित होने की आशंका जताई गई है।
सॉफ्टवेयर से जुड़े मुद्दों के अलावा पात्र मतदाताओं के नाम हटाने के लिए दायर अपीलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए। रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में बूथ स्तर के अधिकारियों ने बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के अनुरोधों पर आपत्तियां दर्ज कीं। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में करीब 12 प्रतिशत की कमी का उल्लेख भी रिपोर्ट में किया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर गठित अपील पंचाटों के समक्ष लंबित मामलों की संख्या भी चिंता का विषय बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार करीब 38 लाख अपीलें लंबित थीं और पिछले पांच महीनों में 1,26,194 अपीलों का निपटारा हुआ। इसी गति को आधार मानें तो सभी मामलों के निपटारे में लंबा समय लग सकता है। हालांकि ऐसे आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि और उनके संदर्भ को समझना भी जरूरी है।
इस पूरी बहस के केंद्र में चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता का प्रश्न भी जुड़ता है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता वाली तीन सदस्यीय समिति का सुझाव दिया था। बाद में कानून में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया।
इस व्यवस्था पर विपक्ष की ओर से संस्थागत संतुलन को लेकर आपत्तियां उठाई गई हैं। कम से कम दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता की असहमति की चर्चा भी इसी संदर्भ में हुई है। चुनाव आयोग में नियुक्ति से संबंधित कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजे जाने की सिफारिश का भी उल्लेख किया गया है।
चुनाव आयोग जैसी संस्था की विश्वसनीयता केवल चुनाव कराने की क्षमता से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों की पारदर्शिता, संस्थागत संतुलन और सभी संबंधित पक्षों के विश्वास से भी जुड़ी होती है। मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना नागरिक के सीधे लोकतांत्रिक अधिकार से संबंधित विषय है। इसलिए ऐसी किसी भी प्रक्रिया में स्पष्ट नियम, स्थानीय स्तर पर उचित सत्यापन, अपील का प्रभावी अवसर और तकनीकी प्रणालियों की जवाबदेही आवश्यक है।
लोकतंत्र की संस्थाएं केवल कानूनों से नहीं, बल्कि उनके भीतर मौजूद संतुलन और पारदर्शिता से मजबूत होती हैं। चुनाव आयोग के संदर्भ में उठे सवालों का अंतिम समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजी तथ्यों, स्वतंत्र जांच, न्यायिक परीक्षण और संस्थागत सुधार से होना चाहिए। मतदाता का विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है और उसकी रक्षा चुनाव प्रक्रिया के हर स्तर पर होनी चाहिए।

