Report by : News Desk
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मतदाता सूची में पारदर्शिता लोकतंत्र की पहली शर्त
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मतदाता सूची में पारदर्शिता लोकतंत्र की पहली शर्त

कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर उठे सवालों ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर बहस को तेज कर दिया है। उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने निर्वाचन अधिकारियों से विधानसभा क्षेत्रवार उन आपत्तियों का ब्योरा मांगा है, जिनके आधार पर मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई। उन्होंने यह भी कहा है कि यदि किसी ने जानबूझकर गलत तरीके से मतदाता का नाम हटाने का प्रयास किया है तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज होनी चाहिए।

यह मांग ऐसे समय सामने आई है जब नागरिक संगठनों के एक ऑडिट ने SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थानांतरित या मृत दर्ज किए जाने का आरोप लगाया है। 25 जिलों के 100 मतदान केंद्रों पर घर-घर सत्यापन पर आधारित इस रिपोर्ट में ऐसे मामलों का उल्लेख है, जिनमें संबंधित मतदाता कथित तौर पर उसी पते पर रह रहे थे, फिर भी उनका वर्गीकरण बदल दिया गया। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह नागरिक संगठनों का सर्वे है, निर्वाचन आयोग द्वारा अंतिम रूप से प्रमाणित निष्कर्ष नहीं।

SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है। मृत, स्थानांतरित, दोहरे या अन्य अयोग्य नामों को हटाना किसी भी निष्पक्ष चुनावी व्यवस्था की सामान्य आवश्यकता है। लेकिन इसी प्रक्रिया में यदि जीवित और पात्र मतदाताओं के नाम भी गलत तरीके से हट जाते हैं तो शुद्धिकरण की प्रक्रिया ही अधिकारों के संकट में बदल सकती है। यही कारण है कि हर आपत्ति के सत्यापन, नोटिस और अपील की प्रक्रिया स्पष्ट और पारदर्शी होना आवश्यक है।

कर्नाटक में फॉर्म-7 को लेकर भी विवाद सामने आया है। इसी फॉर्म के जरिए मतदाता सूची में किसी नाम को हटाने पर आपत्ति दर्ज की जाती है। रिपोर्टों के अनुसार फॉर्म-7 आवेदनों की संख्या को लेकर भी आंकड़ों में अंतर सामने आया है। 24 अगस्त के ड्राफ्ट रोल से संबंधित आंकड़ों में 67,307 फॉर्म-7 आवेदन बताए गए थे, जबकि बाद में मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की ओर से 61,130 आवेदन प्राप्त और संसाधित किए जाने की जानकारी दी गई। लगभग छह हजार के इस अंतर को भी विस्तृत सत्यापन की जरूरत बताई गई है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न राजनीतिक आरोपों से अधिक प्रक्रिया का है। यदि किसी मतदाता के नाम पर आपत्ति दाखिल हुई है तो उसे इसकी जानकारी मिले, आपत्ति का आधार उपलब्ध हो और निर्णय से पहले वास्तविक स्थिति की जांच हो। यदि किसी नागरिक को गलत तरीके से मृत या स्थानांतरित घोषित किया गया है तो उसे नाम बहाल कराने का सरल और समयबद्ध अवसर मिलना चाहिए।

दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति या संगठन ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेजों, गलत सूचनाओं या संगठित तरीके से पात्र मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की है तो जांच के बाद कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन ऐसी कार्रवाई भी प्रमाण और विधिसम्मत जांच के आधार पर ही होनी चाहिए, ताकि चुनावी प्रक्रिया राजनीतिक आरोपों के बजाय दस्तावेजी तथ्यों पर आगे बढ़े।

मतदाता सूची केवल सरकारी रिकॉर्ड नहीं है। यह उस नागरिक की लोकतांत्रिक पहचान का आधार है जिसके जरिए वह शासन चुनने में भाग लेता है। इसलिए सूची को शुद्ध करने और नागरिक के मतदान अधिकार की रक्षा करने—दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन जरूरी है।

कर्नाटक का मौजूदा विवाद इसी व्यापक सिद्धांत की याद दिलाता है कि चुनाव की निष्पक्षता केवल मतदान के दिन सुनिश्चित नहीं होती। वह उससे बहुत पहले मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में शुरू हो जाती है। इसलिए SIR जैसी कवायद में पारदर्शिता, सत्यापन, आंकड़ों की सार्वजनिक उपलब्धता और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था लोकतांत्रिक विश्वास के लिए अनिवार्य हैं।

आखिरकार, किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना और किसी अपात्र व्यक्ति का नाम सूची में बने रहना—दोनों समस्याएं हैं। समाधान किसी एक पक्ष को राजनीतिक रूप से सही ठहराने में नहीं, बल्कि ऐसी प्रक्रिया बनाने में है जिसमें हर नाम के जुड़ने और हटने का आधार जांच योग्य हो और हर वास्तविक मतदाता को अपने मताधिकार की रक्षा का प्रभावी अवसर मिले।

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