Report by : News Desk
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पीएम मोदी ने दिया विनम्रता और निरंतर सीखने का संदेश

संस्कृत सुभाषित साझा कर अहंकार से दूर रहने की सीख
सूर्य के प्रकाश से समझाया छोटी उपलब्धियों का महत्व

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषित साझा कर विनम्रता और निरंतर सीखते रहने का संदेश दिया। श्लोक के माध्यम से उन्होंने समझाया कि किसी व्यक्ति की उपलब्धि या प्रतिभा का प्रभाव परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। इसलिए सफलता मिलने पर अहंकार करने के बजाय विनम्र बने रहना और सीखने की इच्छा बनाए रखना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने यह संस्कृत श्लोक साझा किया—

“खद्योतो द्योतते तावद् यावन्नोदयते शशी।
उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमाः॥”

इसका भावार्थ है कि जुगनू का प्रकाश तभी तक दिखाई देता है, जब तक चंद्रमा उदित नहीं होता। लेकिन जब हजारों किरणों वाला सूर्य निकलता है, तो न जुगनू का प्रकाश दिखाई देता है और न ही चंद्रमा का। इस उदाहरण के जरिए बताया गया है कि बड़ी उपलब्धि या श्रेष्ठ प्रतिभा के सामने छोटी उपलब्धि का प्रभाव कम हो सकता है।

श्रेष्ठता के सामने बदलता है प्रभाव

इस सुभाषित का संदेश केवल प्रकाश के उदाहरण तक सीमित नहीं है। यह व्यक्ति को अपनी उपलब्धियों और क्षमताओं के प्रति संतुलित दृष्टिकोण रखने की सीख भी देता है। जब तक कोई अधिक प्रतिभाशाली या अनुभवी व्यक्ति सामने नहीं आता, तब तक किसी व्यक्ति की क्षमता सबसे बड़ी दिखाई दे सकती है। लेकिन बेहतर ज्ञान, अनुभव और प्रतिभा सामने आने पर उसकी सीमाएं भी स्पष्ट हो सकती हैं।

ऐसे में सफलता को अंतिम पड़ाव मानने के बजाय सीखने की प्रक्रिया जारी रखना जरूरी है। विनम्रता व्यक्ति को अपनी कमियों को स्वीकार करने, दूसरों के अनुभवों से सीखने और बेहतर बनने का अवसर देती है। इसके विपरीत, अहंकार नई बातें सीखने और अपनी गलतियों को समझने में बाधा बन सकता है।

सुभाषित में सूर्य, चंद्रमा और जुगनू के प्रकाश के अंतर के माध्यम से इसी विचार को सरल तरीके से व्यक्त किया गया है। यह संदेश व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ शिक्षा, कार्यक्षेत्र और सामाजिक व्यवहार में भी प्रासंगिक है।

संस्कृत साहित्य में मिलता है सुभाषित

प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया यह श्लोक संस्कृत सुभाषित परंपरा से जुड़ा है। उपलब्ध स्रोत सामग्री के अनुसार, इसे संस्कृत के प्रसिद्ध सुभाषित संग्रह ‘सुभाषितरत्नभांडागारम्’ के ‘सूर्यान्योक्ति’ अध्याय में संकलित बताया गया है। विभिन्न संस्कृत लोकोक्ति और सुभाषित कोशों में भी इसका उल्लेख मिलता है।

श्लोक का मूल भाव यह है कि व्यक्ति को अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने के बजाय निरंतर बेहतर बनने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान और प्रतिभा का क्षेत्र व्यापक है। इसलिए किसी एक सफलता के आधार पर स्वयं को सर्वोत्तम मान लेना उचित नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी की इस पोस्ट का केंद्रीय संदेश भी यही है कि जीवन में विनम्रता और सीखने की प्रवृत्ति बनाए रखना महत्वपूर्ण है। जिस तरह सूर्य के उदय होने पर जुगनू और चंद्रमा का प्रकाश फीका पड़ जाता है, उसी तरह नई प्रतिभा और बेहतर उपलब्धियां हमारी सोच को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सकती हैं।

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