प्रकृति की नाराज़गी हैं भयंकर…!

Nature's anger is terrible...!

नाराज़ प्रकृति की नाराज़गी हैं भयंकर,
स्वार्थवश संसाधनों का ‘दोहन’ निरंतर।
प्रकृति-मानव का संबंध सदियों पुराना,
ऊपर उठाया लाभ चुरा लिया खजाना।
पिघल रहे ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन,
असमय बाढ़, सूखा, तूफान, भूस्खलन।
प्राकृतिक विपदाओं से जूझ रहा मानव,
मानवीय हस्तक्षेप की भूमिका में दानव।
अचानक बाढ़ गांवों का अस्तित्व मिटा,
घटनाओं ने जन-धन का नुकसान लूटा।
इस भीषण तबाही के हम साक्षी बने हैं,
सालों की मेहनत 30 सेकंड लें चलें हैं।

संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986