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  • Jantar Mantar Update: संसद चलो प्रदर्शन के बाद शिक्षा विवाद पर सियासत तेज, विपक्ष ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग दोहराई

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    Jantar Mantar Update के तहत 20 जुलाई को आयोजित ‘संसद चलो’ प्रदर्शन और उसके बाद प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई ने देश की शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और सरकार की जवाबदेही को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। प्रदर्शन के बाद कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव ठाकरे), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, आम आदमी पार्टी और बीजू जनता दल सहित कई विपक्षी दल आंदोलन के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं। विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार से केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर जवाबदेही तय करने की बात कही है।

    इस बीच लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिए जाने के बाद राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राहुल गांधी पर छात्रों के मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) समेत शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर संसद में चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है। इन घटनाक्रमों के बाद अब सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह बन गया है कि क्या यह आंदोलन विपक्षी दलों के लिए एक साझा मंच तैयार कर सकता है या फिर यह केवल एक सीमित अवधि की राजनीतिक एकजुटता साबित होगी।

    Jantar Mantar Update के बाद 2011 के आंदोलन से की जा रही तुलना

    राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों के बीच इस आंदोलन की तुलना वर्ष 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से भी की जा रही है। वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार और द हिन्दू की पूर्व एसोसिएट एडिटर स्मिता गुप्ता का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में कुछ समानताएं अवश्य दिखाई देती हैं।

    उनके अनुसार वर्ष 2011 में भारतीय जनता पार्टी तत्कालीन कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सक्रिय थी, लेकिन आम जनता ने राजनीतिक दलों के बजाय अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन पर अधिक भरोसा जताया था। बाद की राजनीतिक परिस्थितियों में वर्ष 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाई।

    स्मिता गुप्ता का कहना है कि वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था का मुद्दा लंबे समय से विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, उठाती रही है, लेकिन उसे व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला। उनका मानना है कि जब यही मुद्दा अभिजीत दीपके द्वारा शुरू किए गए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ अभियान के माध्यम से सामने आया तो बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन इस आंदोलन को मिलने लगा।

    उनका यह भी कहना है कि इस आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर आम लोगों के भीतर मौजूद असंतोष और नाराजगी को सार्वजनिक रूप से सामने लाने का काम किया है। हालांकि उनके अनुसार आंदोलन की संगठनात्मक क्षमता सीमित हो सकती है, लेकिन इससे विपक्षी दलों को सरकार के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाने का अवसर अवश्य मिला है।

    Jantar Mantar Update पर वरिष्ठ पत्रकारों की अलग-अलग राजनीतिक राय

    इस पूरे घटनाक्रम को लेकर वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार रशीद किदवई और विजय त्रिवेदी ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण सामने रखे हैं।

    रशीद किदवई का मानना है कि वर्ष 2011 और वर्तमान आंदोलन की परिस्थितियां पूरी तरह समान नहीं हैं। उनके अनुसार 2011 के आंदोलन को मुख्यधारा के मीडिया का व्यापक समर्थन मिला था, जिससे वह राष्ट्रीय स्तर का बड़ा जनआंदोलन बन सका। उनका कहना है कि वर्तमान समय में मीडिया का एक बड़ा वर्ग इस आंदोलन को अलग नजरिए से प्रस्तुत कर रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया आज प्रभावशाली माध्यम अवश्य है, लेकिन उसकी पहुंच और प्रभाव उपयोगकर्ताओं की रुचियों पर आधारित होता है। ऐसे में लंबे समय तक बड़े स्तर पर जनसमर्थन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

    रशीद किदवई का यह भी मानना है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में क्षेत्रीय दल अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई दे रहे हैं। उनके अनुसार यदि इस आंदोलन से किसी राजनीतिक दल को सबसे अधिक लाभ मिलने की संभावना है तो वह कांग्रेस हो सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि विपक्ष इस मुद्दे को कितनी प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा पाता है और सरकार उसकी राजनीतिक चुनौती का किस प्रकार जवाब देती है।

    वहीं वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी का कहना है कि 2011 के आंदोलन के दौरान तत्कालीन सरकार पर बढ़ा दबाव केवल जनआंदोलन की वजह से नहीं था, बल्कि विपक्षी दलों की सक्रिय राजनीतिक भूमिका भी उसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण थी। उनके अनुसार वर्तमान समय में भी सरकार पर कुछ हद तक दबाव बना है, लेकिन इस दबाव को बनाए रखना पूरी तरह विपक्ष की रणनीति और एकजुटता पर निर्भर करेगा।

    Jantar Mantar Update के बीच विपक्षी दलों में भी दिखे मतभेद

    जहां एक ओर कई विपक्षी दल इस आंदोलन के समर्थन में एक मंच पर दिखाई दिए, वहीं दूसरी ओर कुछ घटनाओं ने विपक्ष के भीतर मतभेदों की भी झलक दिखाई।

    प्रधानमंत्री आवास के बाहर राहुल गांधी के धरने को लेकर आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर टिप्पणी करते हुए आरोप लगाया कि इससे मूल आंदोलन कमजोर पड़ सकता है। हालांकि इस टिप्पणी का जवाब कॉकरोच जनता पार्टी के आधिकारिक एक्स हैंडल से दिया गया, जिसमें कहा गया कि लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी अपना संवैधानिक दायित्व निभा रहे हैं और आंदोलन को कमजोर करने जैसी बात सही नहीं है।

    इस बीच आंदोलन से जुड़े अभिजीत दीपके के पुराने और वर्तमान राजनीतिक रुख पर भी चर्चा शुरू हो गई है। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि पहले राहुल गांधी को लेकर उनकी अलग व्यक्तिगत राय थी, लेकिन जब कांग्रेस ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी उनकी मांगों का समर्थन किया तो उनके दृष्टिकोण में बदलाव आया।

    20 जुलाई के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के बाद शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और छात्रों के भविष्य का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बन चुका है। अब आने वाले दिनों में संसद के भीतर होने वाली चर्चा, विपक्ष की रणनीति और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेगी। साथ ही यह भी स्पष्ट होगा कि यह आंदोलन केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित रहता है या फिर व्यापक राजनीतिक विमर्श और आगामी चुनावी राजनीति पर भी इसका प्रभाव डालने में सफल होता है।

    Rahul vs Akhilesh: नीट आंदोलन पर विपक्ष में दरार? संसद के भीतर और बाहर कांग्रेस-सपा में बढ़ा टकराव

    Rahul vs Akhilesh को लेकर संसद के मानसून सत्र के दौरान नया राजनीतिक विवाद सामने आया है। नीट और छात्रों के आंदोलन को लेकर विपक्ष जहां एक ओर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच मतभेद खुलकर सामने आते दिखाई दिए। सूत्रों के अनुसार लोकसभा की कार्यवाही स्थगित होने के बाद समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल के बीच तीखी बहस हुई। इससे पहले सदन के भीतर भी अखिलेश यादव ने यह टिप्पणी कर राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी कि “क्या समझौता हो गया है?” उनके इस बयान को कांग्रेस और भाजपा के बीच कथित समझौते के आरोप के रूप में देखा जा रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष की रणनीतिक एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर कांग्रेस शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को प्रमुख मुद्दा बना रही है, वहीं समाजवादी पार्टी का जोर छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई और आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर पहले जवाबदेही तय करने पर दिखाई दिया। ऐसे में संसद के भीतर शुरू हुआ यह विवाद अब राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।

    Rahul vs Akhilesh के बीच लोकसभा में बोलने को लेकर शुरू हुआ विवाद

    सूत्रों के अनुसार लोकसभा की कार्यवाही दोपहर 12 बजे शुरू होते ही नीट और छात्रों के मुद्दे पर विपक्षी सांसदों ने जोरदार हंगामा किया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अपनी बात रखना चाहते थे, लेकिन अध्यक्ष ने पहले कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल को बोलने का अवसर दिया। उनके बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने अपनी बात रखी।

    बताया जाता है कि इससे अखिलेश यादव नाराज हो गए। उन्होंने हेडफोन उतार दिया और अपने सांसदों के साथ वापस जाने के लिए मुड़ गए। इस दौरान लोकसभा अध्यक्ष ने उन्हें रोकते हुए कहा कि उन्हें भी बोलने का अवसर दिया जाएगा। इसके जवाब में अखिलेश यादव ने टिप्पणी की कि “क्या बोलें? आपने दोनों को बोलने का मौका दे दिया। क्या समझौता हो गया है?”

    अखिलेश यादव ने इस दौरान कहा कि छात्रों पर हुई कथित बर्बरता के लिए पहले जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बेटियों के कपड़े फाड़े जा रहे हैं और इस पूरे मामले में कार्रवाई आवश्यक है। उनके अनुसार इस्तीफे की मांग बाद में भी उठाई जा सकती है, लेकिन छात्रों के साथ हुई घटनाओं का जवाब पहले मिलना चाहिए।

    Rahul vs Akhilesh विवाद के बीच सदन के बाहर भी हुई तीखी बहस

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    सूत्रों के मुताबिक लोकसभा की कार्यवाही दोपहर दो बजे तक स्थगित होने के बाद भी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं के बीच मतभेद खत्म नहीं हुए। सदन के बाहर कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने अखिलेश यादव से पूछा कि उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर जोर क्यों नहीं दिया, जबकि कांग्रेस इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही है।

    बताया जाता है कि इस पर अखिलेश यादव ने दोहराया कि छात्रों पर हुई कथित कार्रवाई का जवाब पहले मिलना चाहिए और इस्तीफे का सवाल बाद में भी उठाया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार दोनों नेताओं के बीच इस मुद्दे पर कुछ समय तक बातचीत और बहस जारी रही।

    सूत्र यह भी बताते हैं कि कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल अखिलेश यादव के बयान से नाराज थे। वहीं अखिलेश यादव ने कांग्रेस नेतृत्व से यह शिकायत भी जताई कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर राहुल गांधी के नेतृत्व में आयोजित धरने से पहले अन्य विपक्षी दलों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया।

    उनका कहना था कि विपक्ष की साझा रणनीति के तहत ऐसे कार्यक्रमों की जानकारी सभी सहयोगी दलों को पहले दी जानी चाहिए थी। इस मुद्दे ने विपक्षी गठबंधन के भीतर समन्वय को लेकर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    Rahul vs Akhilesh बहस के बीच संसद में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़ा विपक्ष

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच संसद में नीट और शिक्षा व्यवस्था का मुद्दा लगातार गर्माया रहा। कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक लोकसभा में इस विषय पर चर्चा संभव नहीं है।

    राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी नियम 267 के तहत चर्चा की मांग करते हुए कहा कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बिना सार्थक चर्चा नहीं हो सकती। दूसरी ओर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने कहा कि सरकार चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन चर्चा सदन के निर्धारित नियमों के अनुसार ही होगी।

    उन्होंने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाते हुए कहा कि संसद की मर्यादा का सम्मान किया जाना चाहिए। लगातार हंगामे के कारण लोकसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई और अंततः सदन को अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दिया गया।

    इससे पहले आम आदमी पार्टी ने भी प्रधानमंत्री आवास के बाहर राहुल गांधी के धरने को लेकर सवाल उठाए थे। पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने आरोप लगाया था कि छात्रों के मूल आंदोलन का प्रभाव कम करने के लिए राहुल गांधी को वहां धरना देने की अनुमति दी गई। हालांकि इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

    नीट आंदोलन और छात्रों के मुद्दे पर शुरू हुई राजनीतिक बहस अब केवल सरकार और विपक्ष तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विपक्षी दलों के भीतर रणनीति और नेतृत्व को लेकर भी मतभेद सामने आने लगे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष इन मतभेदों को दूर कर साझा रणनीति बना पाता है या यह विवाद आगे भी राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना रहता है।

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    News Desk

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