
सार्वजनिक जीवन में दायित्व, करुणा और अंतिम व्यक्ति का कल्याण
भारतीय संदर्भ में सेवा का अर्थ निःस्वार्थ भाव से कार्य करना, दूसरों के प्रति जिम्मेदारी निभाना, विनम्रता और करुणा के साथ समाज के लिए योगदान देना है। इसे पश्चिमी अर्थों में प्रचलित ‘परोपकार’ का समानार्थी मानना भी पर्याप्त नहीं होगा। परोपकार में जहां दूसरे के लिए कुछ करने का भाव प्रमुख हो सकता है, वहीं भारतीय परंपरा में सेवा व्यक्ति के आत्म-परिवर्तन का माध्यम भी बनती है। व्यक्ति सेवा इसलिए करता है क्योंकि वह इसे अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी का हिस्सा मानता है।
सात अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। सात अक्टूबर 2026 को उनके सार्वजनिक जीवन में इस पड़ाव के 25 वर्ष पूरे होंगे। यह अवसर केवल एक राजनीतिक यात्रा की अवधि को देखने का नहीं, बल्कि शासन और सार्वजनिक जीवन को ‘सेवा’ की अवधारणा से जोड़कर समझने का भी अवसर है। नरेंद्र मोदी ने विभिन्न अवसरों पर अपनी सार्वजनिक यात्रा को राष्ट्रसेवा, कृतज्ञता और उद्देश्य से जोड़कर व्यक्त किया है।
भारतीय जनता पार्टी ने भी इस पड़ाव को ‘सेवा’ के विचार के माध्यम से रेखांकित किया है। 17 सितंबर 2026 को उनके जन्मदिन के अवसर पर भाजपा ने देशव्यापी ‘सेवा संकल्प अभियान’ शुरू किया, जो 17 अक्टूबर तक चलने वाला है। अभियान का मूल संदेश ‘जन सेवा से देश सेवा’ है।
सेवा की यह अवधारणा सार्वजनिक जीवन की उस भूमिका को सामने रखती है, जिसमें शासन और राजनीति का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और कल्याण की पहुंच सुनिश्चित करना माना जाता है। इसी संदर्भ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ‘अंत्योदय’ की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। अंत्योदय का मूल भाव समाज और अर्थव्यवस्था के सबसे अंतिम व्यक्ति के उत्थान और कल्याण से जुड़ा है।
विकास की कसौटी केवल अर्थव्यवस्था के आकार या योजनाओं की संख्या से तय नहीं होती। यह भी देखना जरूरी है कि विकास का लाभ उस व्यक्ति तक कितना पहुंचा, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे पीछे है। अंत्योदय इसी अंतिम व्यक्ति को विकास के केंद्र में रखने की अवधारणा है।
पिछले दशक में गरीबी और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कुछ मापनीय संकेतक भी सामने आए हैं। नीति आयोग के अनुसार, 2013-14 और 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। विश्व बैंक की पावर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ के अनुसार, प्रतिदिन 2.15 डॉलर की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली भारतीय आबादी का अनुपात 2011-12 में 16.2 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 2.3 प्रतिशत रह गया।
सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी विस्तार दर्ज किया गया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में प्रभावी सामाजिक सुरक्षा कवरेज 24 प्रतिशत से बढ़कर 64.3 प्रतिशत हो गया है। लगभग 94 करोड़ नागरिक कम-से-कम एक सामाजिक सुरक्षा उपाय के दायरे में हैं। इन आंकड़ों को सेवा की उस व्यापक अवधारणा से जोड़कर देखा जा सकता है, जिसमें सार्वजनिक सत्ता को अधिकार के साथ जिम्मेदारी के रूप में भी समझा जाता है।
‘सेवा संकल्प अभियान’ में इसी विचार को विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से सामने रखने का प्रयास किया गया है। अभियान के अंतर्गत रक्तदान शिविर, स्वच्छता अभियान, स्वास्थ्य और कल्याण संबंधी कार्यक्रम, जनसंपर्क, युवाओं की भागीदारी तथा सामुदायिक गतिविधियां शामिल हैं।
हालांकि सेवा की अवधारणा किसी एक राजनीतिक कार्यक्रम या किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। ‘जन सेवा से देश सेवा’ का संदेश भी किसी एक वर्षगांठ तक सीमित नहीं माना जा सकता। भारतीय चिंतन में व्यक्ति के कल्याण और राष्ट्र की प्रगति को परस्पर जुड़ी हुई प्रक्रियाओं के रूप में देखा गया है।
नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष का यह पड़ाव इसी व्यापक प्रश्न को सामने रखता है कि सेवा का वास्तविक अर्थ क्या है।

