
भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने के आंकड़े सामने आ रहे हैं, लेकिन क्या इसे वास्तविक लैंगिक समानता का संकेत माना जा सकता है? विश्व आर्थिक मंच की वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक-2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, आर्थिक भागीदारी और अवसर के मामले में भारत का स्तर 41.2 प्रतिशत है। वहीं, महिलाओं और पुरुषों के बीच श्रमबल भागीदारी में समानता का स्तर लगभग 44.1 प्रतिशत बताया गया है। ये आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में प्रगति के बावजूद आर्थिक जीवन में महिलाओं को बराबरी मिलने की चुनौती बनी हुई है।
आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण के अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र की महिलाओं की श्रमबल भागीदारी दर 34.8 प्रतिशत रही, जो अगस्त 2025 के 33.7 प्रतिशत से अधिक है। ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 39.4 प्रतिशत और शहरी महिलाओं की 25.4 प्रतिशत दर्ज की गई। यह बढ़ोतरी महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल रोजगार में महिलाओं की संख्या बढ़ने से समानता का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता। यह भी देखना जरूरी है कि महिलाओं को किस तरह का काम मिल रहा है, उनकी आय कितनी है और रोजगार के साथ घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ कितना है।
यहीं घरेलू श्रम का सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। वर्ष 2024 के सर्वेक्षण के मुताबिक, छह वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं में 81.5 प्रतिशत बिना भुगतान घरेलू काम करती थीं, जबकि पुरुषों में यह हिस्सेदारी 27.1 प्रतिशत थी। घरेलू काम में महिलाओं ने प्रतिदिन औसतन 289 मिनट लगाए, जबकि पुरुषों ने 88 मिनट। परिवार के सदस्यों की देखभाल में भी महिलाओं का औसत समय 137 मिनट और पुरुषों का 75 मिनट रहा। ये आंकड़े बताते हैं कि घर के भीतर काम और जिम्मेदारियों का बंटवारा अब भी काफी असमान है।
भोजन बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना, बच्चों की देखभाल करना, बुजुर्गों की जरूरतें पूरी करना और घर की रोजमर्रा की व्यवस्था संभालना ऐसे काम हैं, जिनके बिना परिवार का जीवन चलना कठिन है। फिर भी इन कार्यों को अक्सर औपचारिक श्रम की तरह नहीं देखा जाता, क्योंकि इनके लिए नियमित वेतन नहीं मिलता। घर के भीतर होने के कारण इनकी मेहनत और आर्थिक महत्व भी कई बार नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। जबकि इन जिम्मेदारियों को निभाने में लगने वाला समय महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और व्यक्तिगत जीवन के अवसरों को प्रभावित करता है।
समस्या तब और बढ़ जाती है, जब कोई महिला घर के बाहर नौकरी या कारोबार करने लगती है, लेकिन घर की जिम्मेदारियां पहले की तरह उसी के हिस्से में बनी रहती हैं। ऐसी स्थिति में उसे दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। एक ओर रोजगार से जुड़ी अपेक्षाएं होती हैं, दूसरी ओर परिवार की देखभाल का काम भी कम नहीं होता। इससे थकान और समय की कमी बढ़ सकती है तथा बेहतर नौकरी चुनने, प्रशिक्षण लेने या पदोन्नति के अवसरों का लाभ उठाने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए महिलाओं की आर्थिक भागीदारी पर चर्चा करते समय यह सवाल भी जरूरी है कि उनके पास अपने भविष्य और विकास के लिए कितना समय बचता है।
घरेलू काम का असमान बंटवारा केवल परिवारों की निजी व्यवस्था का विषय नहीं है। इसके पीछे लंबे समय से चली आ रही सामाजिक धारणाएं भी हैं। अक्सर यह मान लिया जाता है कि खाना बनाना, बच्चों को संभालना और घर की व्यवस्था देखना महिलाओं का काम है, जबकि कमाई की मुख्य जिम्मेदारी पुरुषों की है। समय के साथ रोजगार और अर्थव्यवस्था में बदलाव आए हैं, लेकिन इन धारणाओं में उतना परिवर्तन नहीं हुआ। ऐसी सोच पुरुषों पर भी एक तरह का दबाव डालती है कि उन्हें हर स्थिति में परिवार का मुख्य कमाने वाला बनना चाहिए और घरेलू काम में उनकी भूमिका सीमित रहनी चाहिए।
इस मानसिकता को बदलने की शुरुआत घर से हो सकती है। घरेलू काम में पुरुषों की भागीदारी को महिलाओं की मदद के रूप में नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। बच्चों की देखभाल, भोजन तैयार करना, सफाई करना और बुजुर्गों की सेवा करना परिवार के सभी सक्षम सदस्यों की जिम्मेदारी हो सकती है। जब बच्चे अपने घर में काम का समान बंटवारा देखेंगे, तो उनके भीतर भी यह धारणा मजबूत होगी कि कोई काम केवल स्त्री या पुरुष के लिए निर्धारित नहीं है।
शिक्षा इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। पाठ्यपुस्तकों, कहानियों और सामाजिक गतिविधियों में महिलाओं को केवल घरेलू भूमिकाओं में और पुरुषों को केवल कमाने वाले के रूप में दिखाने से पुरानी धारणाएं मजबूत हो सकती हैं। इसके विपरीत, लड़कियों को विज्ञान, तकनीक, कृषि, प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में तथा लड़कों को देखभाल और घरेलू कामों में सहज रूप से शामिल दिखाना जरूरी है। इससे बच्चों को यह समझने का अवसर मिलेगा कि किसी काम की पहचान करने वाला व्यक्ति उसका लिंग नहीं, बल्कि उसकी क्षमता, रुचि और जिम्मेदारी है।
महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए रोजगार के अवसरों की उपलब्धता के साथ सुरक्षित कार्यस्थल, उचित पारिश्रमिक, कौशल विकास, पदोन्नति और सुरक्षित परिवहन भी आवश्यक हैं। परिवार और काम के बीच संतुलन बनाने वाली व्यवस्थाएं तथा बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल के लिए सुविधाएं महिलाओं के लिए रोजगार जारी रखना आसान बना सकती हैं। देखभाल की जिम्मेदारियों को केवल परिवार का निजी मामला मानने के बजाय व्यापक सामाजिक जरूरत के रूप में देखना चाहिए। इससे महिलाओं पर पड़ने वाला असमान बोझ कम करने में मदद मिल सकती है।
वेतन और नेतृत्व के अवसरों में असमानता भी इस चुनौती का हिस्सा है। लेख में उद्धृत वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक-2026 के अनुसार, भारत में अनुमानित अर्जित आय की लैंगिक समानता का स्तर 54.9 प्रतिशत और समान काम के लिए वेतन-समानता का स्तर 51.3 प्रतिशत बताया गया है। वहीं, विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों के स्तर पर महिलाओं की हिस्सेदारी से जुड़ा समानता सूचकांक केवल 13.1 प्रतिशत है। ये आंकड़े इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि रोजगार तक पहुंच बनाने के साथ महिलाओं के लिए बेहतर आय और निर्णय लेने वाले पदों तक पहुंच सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि कितनी महिलाएं रोजगार में शामिल हैं। यह भी देखना होगा कि उन्हें काम चुनने की स्वतंत्रता कितनी है, उनके श्रम का उचित मूल्य मिल रहा है या नहीं और परिवार तथा समाज के निर्णयों में उनकी भूमिका कितनी है। बिना भुगतान वाले घरेलू श्रम को आर्थिक और सामाजिक महत्व देना भी इस दिशा में आवश्यक कदम है। इसके लिए आंकड़ों, नीतियों और सामाजिक व्यवहार में घरेलू काम की वास्तविक भूमिका को स्वीकार करना होगा।
लैंगिक समानता का अर्थ महिलाओं को पुरुषों जैसी भूमिकाएं अपनाने के लिए कहना भर नहीं है। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति के अवसर उसके लिंग के कारण सीमित न हों और परिवार की जिम्मेदारियां भी न्यायपूर्ण तरीके से साझा हों। अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सा काम महिला का है और कौन-सा पुरुष का, बल्कि यह होना चाहिए कि जिम्मेदारियों का बंटवारा कैसे अधिक समान और व्यावहारिक बनाया जा सकता है। जब घरेलू श्रम को सम्मान मिलेगा, महिलाओं को उनकी मेहनत के अनुरूप वेतन और अवसर मिलेंगे तथा परिवार की जिम्मेदारियां साझा होंगी, तभी आर्थिक विकास के साथ लैंगिक समानता भी मजबूत हो सकेगी।

