Report by : Neha Singh
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दलालों के सहारे सरकारी विभाग: फहीम अख्तर
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  • बिजनौर।

समाजसेवी फहीम अख्तर उर्फ राजा ने सरकारी विभागों में दलालों की सक्रियता को देखते हुए चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि  अधिकांश लोग इन दलालों के चक्कर में पढ़ कर अपनी जेबों को कटवा रहे हैं । यह दलाल किसी भी सरकारी विभाग में कार्य को मिनटों में करा देते हैं ।

जिससे लोग इनके चक्कर में आकर मोटी रकम इन दलालों को दे देते हैं। सरकारी विभाग के कर्मचारी भी बिना इन दलालों के सीधे मुंह आम नागरिक से बात तक नहीं करते। उन्होंने कहा कि आजकल हर कहीं दलाल नजर आते हैं। जहां दलाल नहीं होना चाहिए वहां भी।

इन दलालों के चलते देश में व्यवस्थाएं ठप हैं और लोगों में असंतोष फैला हुआ है। दलालों के कारण कई जगह असंवेदनशीलता की हदें पार हो गई हैं। दलालों के कारण ही देश में खाद्य वस्तुओं और प्रॉपर्टी के रेट आसमान पर हैं। लाखों प्रकार के दलाल आपको दिखाई दे जाएंगे। वायदा बाजार के दलाल, शेयर बाजार के दलाल और सरकारी विभागों के दलालों के बारे में तो सभी जानते हैं कि ये क्या करते हैं?

 स्कूल या कॉलेज में एडमिशन के लिए तो दलाल हैं ही लेकिन आजकल अस्पतालों में मरीजों की भर्ती को बढ़ाने के लिए भी दलाल हैं। हालांकि ये नजर नहीं आते फिर भी ये काम करते हैं। ये दलाल मरीजों को कन्वींस करते हैं कि फलां-फलां अस्पताल अच्छा है और बहुत कम में आपका काम हो जाएगा।

ऐसे में किसी व्यक्ति की किडनी खराब नहीं हो तब भी डायलिसिस करवा दिया जाता है। ऑक्सीजन की जरूरत नहीं हो तब भी ऑक्सीजन लगाकर उसका अलग से चार्ज लिया जाता है। आखिर दलाल के पैसे जो निकालना है। अस्पताल के अहाते में स्थित मेडिकल की दुकान में दवाइयों के भाव और बाजार में मिलने वाली दवाइयों के भावों में भारी फर्क देखने को मिलता है।

हां आप दलाओं के माध्यम से दवाइयां लेंगे तो आपको सस्ती मिल सकती है। कई अस्पताल दलालों के हवाले हैं। मरीजों को फांसकर दलालों के हवाले कर दिया जा रहा है। उनका आर्थिक शोषण किया जाता है। इस तंत्र में डॉक्टर, निजी सेंटर, दवा के दुकानदार, सुरक्षा गार्ड और कई कर्मचारी भी शामिल रहते हैं।

कई दलाल तो सरकारी अस्पतालों में घुमते रहते हैं। वे मरीजों को प्राइवेट अस्पताल ले जाने के लिए दबाव बनाते हैं। दलाल के इस खेल में अस्पताल के कई कर्मचारी भी शामिल रहते हैं। ये दलाल सस्ते में जांच और इलाज का वादा करके मरीजों को ले उड़ते हैं और अंतत: मरीज उनके जाल में फंसकर खुद को लुटा देते हैं।

दलाओं की महिमा अपरंपार है। यदि किसी ट्रक को जल्दी माल खाली करना हो तो दलाल से संपर्क करके फैक्ट्री में माल खाली करवा सकता है। यातायात विभाग के हाल तो आप जानते ही हैं। हालांकि आजकल लाइसेंस की प्रक्रिया ऑनलाइन होने लगी है फिर भी दलाली तो बनती है। दलाली कहां नहीं है? सरकार को तेजी से बढ़ते हुए  इस दलाली के खेल पर यदि अंकुश नहीं लगाया गया तो आम नागरिक इन दलालों के चक्कर में आकर अपनी जेबें कटवाते रहेंगे।‌

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